भूगोल की प्रमुख शाखाओं में भौतिक भूगोल का केंद्रीय स्थान है। विद्वान फिलिप के अनुसार, “भूगोल एक वृक्ष के समान है जिसकी जड़ें भौतिक भूगोल की मिट्टी में स्थित हैं, तथा इसकी शाखाएँ मानवीय क्रियाकलापों का अध्ययन करती हैं।” इस दृष्टि से भौतिक भूगोल को समस्त भौगोलिक अध्ययन की आधारशिला माना जाता है। भौतिक भूगोल के विकास में प्राचीन विद्वान पोलीडोनियस का महत्वपूर्ण योगदान है, इसलिए उन्हें इस शाखा का जनक कहा जाता है। भौतिक भूगोल पृथ्वी के प्राकृतिक तंत्र, भौतिक संरचना तथा उन प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है, जिनके परिणामस्वरूप पृथ्वी का धरातलीय स्वरूप निर्मित एवं परिवर्तित होता है। अन्य शब्दों में, इसके अंतर्गत स्थलमंडल, वायुमंडल, जलमंडल तथा जीवमंडल से संबंधित प्राकृतिक तत्वों और उनकी पारस्परिक क्रियाओं का विश्लेषण किया जाता है। भौतिक स्वरूप से आशय पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, नदियाँ, महासागर, वनस्पति एवं अन्य प्राकृतिक संरचनाओं से है, जिनका उद्भव भौगोलिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है। इन सभी तत्वों का क्रमबद्ध, तुलनात्मक तथा व्याख्यात्मक अध्ययन भौतिक भूगोल के अंतर्गत किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, भौतिक भूगोल पृथ्वी के धरातल पर पाए जाने वाले विभिन्न प्राकृतिक रूपों के स्थानिक वितरण, उनके विकासक्रम, तथा उनमें होने वाले भौतिक परिवर्तनों के कारण-परिणाम संबंधों की व्याख्या भी करता है। इस प्रकार यह शाखा प्राकृतिक पर्यावरण की संरचना, गतिशीलता तथा क्षेत्रीय विविधताओं को समझने के लिए एक समग्र वैज्ञानिक आधार प्रदान करती है।

परिभाषाएं -

भौतिक भूगोल की अवधारणा को विभिन्न भूगोलवेत्ताओं ने अपने-अपने सैद्धांतिक दृष्टिकोणों के आधार पर परिभाषित किया है, जिनसे इस विषय के क्षेत्र, स्वरूप तथा अध्ययन-विधि का व्यापक बोध होता है। ए. के. लॉबेक के अनुसार, “भौतिक वातावरण एवं जीवन के अंतर्संबंधों का अध्ययन ही भौतिक भूगोल है।” इस परिभाषा में भौतिक एवं जैविक तत्त्वों के पारस्परिक संबंधों को केंद्र में रखा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भौतिक भूगोल केवल निर्जीव प्रकृति का अध्ययन नहीं, बल्कि जीवन और पर्यावरण के अंतःक्रियात्मक संबंधों का भी विश्लेषण करता है। एच. आर. केन के मतानुसार, “भौतिक वातावरण का अध्ययन ही भौतिक भूगोल है।” यह दृष्टिकोण भौतिक भूगोल को प्राकृतिक परिवेश की संरचना, स्वरूप तथा प्रक्रियाओं के व्यवस्थित अध्ययन के रूप में स्थापित करता है।

पियरे बाइरॉट के अनुसार, “मानव सभ्यता से अप्रभावित पृथ्वी के दृश्य प्राकृतिक धरातल का अध्ययन भौतिक भूगोल है।” यह परिभाषा भौतिक भूगोल को मानवजनित प्रभावों से पृथक प्राकृतिक धरातलीय स्वरूपों के विश्लेषण से संबद्ध करती है तथा प्राकृतिक परिदृश्य की स्वाभाविकता पर बल देती है। हैमण्ड एवं हॉर्न के अनुसार, “भौतिक भूगोल प्राकृतिक घटनाओं के अध्ययन से संबंधित है।” इस परिभाषा में भौतिक भूगोल को गतिशील प्रक्रियाओं, प्राकृतिक घटनाओं तथा उनके कारण-परिणाम संबंधों के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में निरूपित किया गया है।

आर्थर होम्स ने भौतिक भूगोल की व्याख्या करते हुए इसे भौतिक पर्यावरण के समग्र अध्ययन से संबद्ध किया है। उनके अनुसार, “भौतिक पर्यावरण का अध्ययन ही भौतिक भूगोल है, जो ग्लोब के धरातलीय उच्चावच (भू-आकृतिक विज्ञान), सागर एवं महासागरों (समुद्र विज्ञान) तथा वायुमंडलीय तत्त्वों (जलवायु विज्ञान) के विवरणों का अध्ययन करता है।” इस परिभाषा में भौतिक भूगोल के प्रमुख उपविषयों यथा - स्थलमंडलीय संरचना, महासागरीय तत्त्व तथा वायुमंडलीय प्रक्रियाओं को समेकित रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे इस शाखा की बहुआयामी प्रकृति स्पष्ट होती है।

उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भौतिक भूगोल भौतिक तथा जैविक वातावरण के वितरण प्रतिरूपों, उनकी संरचनात्मक विशेषताओं तथा पारस्परिक अंतर्संबंधों का तार्किक, विश्लेषणात्मक एवं व्याख्यात्मक अध्ययन है। इसके अंतर्गत पृथ्वी के भूतल पर विद्यमान प्राकृतिक तत्वों, प्रक्रियाओं तथा उनकी अंतःक्रियाओं का समग्र विश्लेषण किया जाता है।

प्रकृति एवं अध्ययन क्षेत्र - 

भौतिक भूगोल के अध्ययन का केन्द्रीय आधार पृथ्वी का भूतल है, जहाँ विविध प्राकृतिक तत्त्वों, प्रक्रियाओं तथा उनके पारस्परिक अंतर्संबंधों की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। भूगोल की किसी भी शाखा के वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित अध्ययन के लिए भौतिक भूगोल की आधारभूत समझ अनिवार्य है, क्योंकि मानव के सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक क्रियाकलाप प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भौतिक पर्यावरण की संरचना एवं गतिशीलता से प्रभावित होते हैं। इस दृष्टि से भौतिक भूगोल प्राकृतिक पर्यावरण और मानव जीवन के मध्य संबंधों की व्याख्या के लिए आधार प्रदान करता है। पृथ्वी का भौतिक वातावरण मुख्यतः स्थल, जल एवं वायु जैसे प्रमुख घटकों से निर्मित है, जिनमें विविध भौतिक तत्त्व समाहित रहते हैं और जो परस्पर घनिष्ठ रूप से अंतर्संबद्ध एवं अंतःनिर्भर हैं। वायुमंडल, जलमंडल तथा स्थलमंडल के मध्य सतत अंतःक्रियाओं के परिणामस्वरूप ऊर्जा तथा पदार्थ का आदान-प्रदान होता है, जिससे पृथ्वी पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियाँ विकसित होती हैं। यही पारस्परिक अंतर्संबंध जैवमंडल के उद्भव, विकास तथा स्थायित्व का आधार बनते हैं। अतः भौतिक भूगोल केवल पृथ्वी के भौतिक स्वरूपों का स्थिर वर्णन प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि परिवर्तनशील भौतिक वातावरण, गतिशील प्रक्रियाओं तथा उनमें निहित कारण-परिणाम संबंधों का विश्लेषणात्मक अध्ययन भी करता है। अध्ययन की दृष्टि से भौतिक भूगोल को सामान्यतः चार प्रमुख मंडलों—स्थलमंडल, जलमंडल, वायुमंडल तथा जैवमंडल—में विभाजित किया जाता है -

स्थलमंडल -

स्थलमंडल भौतिक भूगोल का वह प्रमुख घटक है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी के ठोस भाग, भू-दृश्यों तथा स्थलरूपों की उत्पत्ति, संरचना, विकास एवं परिवर्तनशीलता का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। स्थलमंडल के अध्ययन में पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ, नदियाँ तथा अन्य स्थलरूपों की उत्पत्ति, संरचनात्मक विशेषताओं एवं विकासक्रम का विश्लेषण किया जाता है। इन स्थलरूपों के निर्माण एवं परिवर्तन में अंतर्जात एवं बहिर्जात शक्तियों जैसे - विवर्तनिक क्रियाएँ, ज्वालामुखीय गतिविधियाँ, अपक्षय, अपरदन तथा निक्षेपण की भूमिका का अध्ययन स्थलमंडलीय विश्लेषण का अभिन्न भाग है। इन सभी भू-दृश्यों तथा प्रक्रियाओं का क्रमबद्ध, वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत अध्ययन भू-आकृति विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है, जो स्थलमंडल की संरचना, गतिशीलता तथा विकासक्रम को समझने के लिए सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। इसमें पृथ्वी के धरातल पर विद्यमान विविध भू-दृश्य, स्थलखंड तथा उनके भिन्न-भिन्न स्वरूपों, अवस्थाओं एवं प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण सम्मिलित है। साथ ही, पृथ्वी के आंतरिक भाग के वे तत्त्व एवं संरचनाएँ भी अध्ययन का विषय बनते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव धरातलीय स्वरूपों के निर्माण एवं विकास पर पड़ता है।

जलमंडल -

जलमंडल भौतिक भूगोल का एक आधारभूत घटक है, जिसके अंतर्गत पृथ्वी पर विद्यमान समस्त जलराशियों विशेषतः सागर, महासागर, समुद्र तथा उनसे संबद्ध जल निकायों की उत्पत्ति, वितरण, संरचना एवं गतिशीलता का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें महासागरीय बेसिनों की संरचनात्मक विशेषताएँ, समुद्री नितल की आकृति, स्थलाकृति तथा विवर्तनिक नियंत्रणों का विश्लेषण सम्मिलित है। साथ ही, महासागरीय जल के भौतिक एवं रासायनिक गुणों, जैसे - तापमान, लवणता, घनत्व तथा दाब के स्थानिक एवं ऊर्ध्वाधर वितरण का अध्ययन भी किया जाता है। जल संचार की प्रक्रियाएँ, सतही एवं गहरी महासागरीय धाराएँ, ज्वार-भाटा, तरंग गतिकी तथा प्रवाल भित्तियों जैसी जैव-भौतिक संरचनाओं का विश्लेषण जलमंडलीय अध्ययन का महत्वपूर्ण अंग है। इसके अतिरिक्त महासागरीय निक्षेपों की प्रकृति, उनके वितरण प्रतिरूप तथा समुद्री पर्यावरण के साथ उनके पारस्परिक संबंधों का अध्ययन वैश्विक जल तंत्र की कार्यप्रणाली को समझने के लिए आवश्यक माना जाता है।

वायुमंडल -

वायुमंडल पृथ्वी को चारों ओर से आवृत्त करने वाला गैसीय आवरण है, जो पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता, ऊर्जा संतुलन तथा जलवायु प्रणाली के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभाता है। यह जीव-जंतुओं एवं वनस्पतियों के अस्तित्व के लिए आवश्यक गैसों की आपूर्ति करता है तथा विकिरणीय संतुलन, तापीय विनियमन और जल चक्र जैसी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है। वायुमंडल के अध्ययन का प्रमुख क्षेत्र जलवायु विज्ञान है, जिसके अंतर्गत वायुमंडलीय दशाओं, प्रक्रियाओं तथा उनसे संबंधित जलवायविक एवं मौसमी परिघटनाओं का विश्लेषण किया जाता है। इसमें वायुमंडल की संरचना एवं संघटन, तापमान का क्षैतिज एवं ऊर्ध्वाधर वितरण, दाब पद्धतियाँ, वैश्विक एवं क्षेत्रीय पवन प्रणालियाँ, आर्द्रता, संघनन, वर्षा प्रक्रियाएँ तथा चक्रवातीय एवं प्रतिचक्रवातीय गतिविधियों का अध्ययन सम्मिलित है। साथ ही, विश्व के विभिन्न जलवायविक प्रदेशों, जलवायु वर्गीकरणों तथा मौसमी परिवर्तनशीलता के स्थानिक वितरण का विश्लेषण भी वायुमंडलीय अध्ययन का अभिन्न अंग है।

जैवमंडल -

जैवमंडल पृथ्वी के उस समेकित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ स्थलमंडल, जलमंडल एवं वायुमंडल की अंतःक्रियाओं के परिणामस्वरूप जीवन का विकास एवं विस्तार संभव होता है। यह भौतिक पर्यावरण और जीवधारियों के मध्य गतिशील संबंधों का अध्ययन क्षेत्र है। इसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों एवं जीव-जंतुओं के स्थानिक वितरण, उनके पारिस्थितिक अनुकूलन, तथा पर्यावरणीय नियंत्रणों का विश्लेषण किया जाता है। जैवमंडल का अध्ययन मुख्यतः जैव-भूगोल के अंतर्गत किया जाता है, जिसे पादप या वनस्पति भूगोल, जन्तु भूगोल तथा मानव पारिस्थितिकी जैसे उपविभागों में विभाजित किया जाता है। इन उपविभागों के माध्यम से जीवधारियों के वितरण प्रतिरूप, पारिस्थितिक अंतःक्रियाएँ, जैव विविधता तथा पर्यावरणीय कारकों के प्रभावों का समग्र अध्ययन किया जाता है, जिससे पृथ्वी के प्राकृतिक पर्यावरण की जैविक संरचना, कार्यप्रणाली एवं गतिशीलता की व्यापक समझ विकसित होती है।

वर्तमान में भौतिक भूगोल की शाखाएं

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भौतिक भूगोल का अध्ययन क्षेत्र अत्यंत व्यापक, बहुआयामी तथा अंतर्विषयी स्वरूप ग्रहण कर चुका है। प्राकृतिक पर्यावरण की जटिलता तथा पृथ्वी तंत्र के विविध घटकों के पारस्परिक संबंधों को समझने के लिए भौतिक भूगोल ने अनेक विशिष्ट उपशाखाओं का विकास किया है। इन उपशाखाओं के माध्यम से पृथ्वी के भौतिक, जैविक तथा पर्यावरणीय तत्त्वों का विश्लेषणात्मक एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है ।

भौतिक भूगोल की प्रमुख शाखाओं में भू-आकृति विज्ञान, भू-गणित, भू-भौतिकी, मृदा विज्ञान, खगोलीय विज्ञान, पर्यावरण या पारिस्थितिकी भूगोल, चिकित्सा भूगोल, जलवायु विज्ञान, जल विज्ञान, समुद्र विज्ञान, हिमनद विज्ञान, जैव-भूगोल तथा मानचित्र कला प्रमुख है ।

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