पृथ्वी का भूपटल एक जटिल, बहुस्तरीय एवं निरंतर विकसित होता हुआ गतिशील तंत्र है, जिसकी संरचनात्मक विन्यास-प्रक्रिया दीर्घावधि में क्रियाशील भू-गतिकीय शक्तियों के परस्पर अंतःक्रियात्मक संतुलन द्वारा नियंत्रित होती है। परिवर्तन यहाँ मात्र दार्शनिक विमर्श का विषय न होकर भू-विज्ञान की केन्द्रीय प्रतिज्ञा है, जिसके अंतर्गत स्थलमंडल सतत रूप से आंतरिक ऊर्जा के पुनर्वितरण, तापीय प्रवणताओं तथा विवर्तनिक प्रक्रियाओं के साथ-साथ बाह्य अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण जैसी बहिर्जात क्रियाओं के सम्मिलित प्रभाव में पुनर्संरचित होता रहता है। किसी भी स्थलरूप की वर्तमान अभिव्यक्ति वस्तुतः एक दीर्घकालिक भू-आकृतिक विकास-क्रम का परिणाम है, जिसमें अन्तर्जात (Endogenic) शक्तियों द्वारा उत्पन्न संरचनात्मक रूपरेखाएँ तथा बहिर्जात (Exogenic) प्रक्रियाओं द्वारा संपादित सतही संशोधन एक जटिल द्वंद्वात्मक, किंतु सहवर्ती संबंध में निरंतर अंतःक्रिया करते रहते हैं।

    अन्तर्जात बल पृथ्वी के आंतरिक ऊष्मीय असंतुलन, मेंटल संवहन धाराओं, प्लेट विवर्तनिकी तथा मैग्माई गतिविधियों से अभिन्न रूप से संबद्ध होते हैं और भूपटल में विविध प्रकार की संरचनात्मक विकृतियों को जन्म देते हैं। इन विकृतियों में वलन, भ्रंश, भ्रंशित खंड, नप्प संरचनाएँ तथा पर्वतनिर्माण जैसी प्रक्रियाएँ प्रमुखता से सम्मिलित हैं, जो स्थलमंडल की मूल संरचनात्मक रूपरेखा का निर्माण करती हैं। इसके विपरीत, बहिर्जात बल जिनकी ऊर्जा का मूल स्रोत सौर विकिरण एवं गुरुत्वाकर्षण है अपक्षय, अपरदन, परिवहन तथा निक्षेपण की प्रक्रियाओं के माध्यम से इन संरचनात्मक विषमताओं को क्रमशः परिमार्जित करते हुए समतलीकरण की प्रवृत्ति की ओर अग्रसर करते हैं। परिणामतः, पृथ्वी की सतह एक गतिशील समतुल्यावस्था (Dynamic Equilibrium) की दिशा में निरंतर विकसित होती रहती है, जहाँ निर्माण (construction) और विनाश (denudation) परस्पर विरोधी होते हुए भी सहवर्ती तथा संतुलनकारी प्रक्रियाओं के रूप में क्रियाशील रहते हैं।

वलन (Folds) : संपीडनात्मक संरचनाओं का विकास

    वलन मूलतः शैल-परतों में संपीडनात्मक तनाव (Compressional Stress) के प्रभाव से उत्पन्न लचीली विकृतियाँ (Ductile Deformations) हैं। जब प्लेट विवर्तनिक प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप दो भू-खण्ड अभिसारी गति (Convergent Motion) प्रदर्शित करते हैं, तब उनके मध्य स्थित अवसादी अथवा रूपांतरित शैल-समूहों पर तीव्र पार्श्विक दाब (Lateral Compression) आरोपित होता है। दीर्घकालिक भू-काल में यह दाब शैलों को प्रत्यास्थ (Elastic) सीमा से परे ले जाकर उन्हें लचीली अवस्था में मोड़ देता है। इस लहरदार अथवा तरंगित संरचना को वलन कहा जाता है।

    वलनों का विकास मुख्यतः उन शैल-समूहों में अधिक स्पष्ट होता है, जिनमें परतबद्धता (Bedding) विद्यमान हो—विशेषकर अवसादी शैलें। वलन की ज्यामिति को समझने हेतु भुजा (Limb), शिखर (Crest), गर्त (Trough), अक्ष (Fold Axis) तथा अक्षीय तल (Axial Plane) जैसी संकल्पनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। वलन पर्वतनिर्माण (Orogeny) की केंद्रीय प्रक्रिया है, और विश्व की अनेक प्रमुख पर्वत-श्रेणियाँ—जैसे वलित पर्वत—संपीडनात्मक वलनों का परिणाम हैं।

    वलनों का वर्गीकरण संरचनात्मक ज्यामिति एवं संपीडन की प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित है—                                                             bodhshankh.blogspot.com

  1. सममित वलन (Symmetrical Fold) – इस प्रकार के वलन में दोनों भुजाओं का झुकाव कोण समान होता है तथा अक्षीय तल लगभग लंबवत् स्थिति में रहता है। यह अपेक्षाकृत संतुलित एवं समान वितरण वाले संपीडन का द्योतक है। सममित वलन संरचनात्मक रूप से सरल माने जाते हैं और प्रायः प्रारंभिक वलन अवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।                                                                                                                                        bodhshankh.blogspot.com

  2.  वलन (Asymmetrical Fold) – जब संपीडन असमान या एकपक्षीय हो, तब वलन की एक भुजा अधिक तीव्र ढाल ग्रहण कर लेती है जबकि दूसरी अपेक्षाकृत मंद झुकाव प्रदर्शित करती है। अक्षीय तल झुका हुआ होता है। यह विवर्तनिक असंतुलन तथा दाब की दिशा-विशिष्टता का संकेत है।                                                                            bodhshankh.blogspot.com

  3. एकदिग्नत वलन (Monoclinal Fold) – यह संरचना एक व्यापक शैल-समूह में एकतरफा झुकाव के रूप में प्रकट होती है, जहाँ परतें एक दिशा में तीव्र अवनमन दर्शाती हैं। प्रायः यह गहन भ्रंश क्रिया अथवा अधोस्थ संरचनात्मक विस्थापन से संबद्ध होती है।                                                                                                                              bodhshankh.blogspot.com

  4. समनत वलन (Isoclinal Fold) – इसमें दोनों भुजाएँ समान दिशा और समान कोण पर झुकी होती हैं, जिससे वे परस्पर लगभग समांतर प्रतीत होती हैं। यह तीव्र एवं दीर्घकालिक संपीडन का परिणाम है। ऐसे वलनों में परतों की पुनरावृत्ति (Repetition of Strata) देखी जा सकती है।                                                                                  bodhshankh.blogspot.com

  5. परिवलित या शयन वलन (Recumbent Fold) – अत्यधिक पार्श्विक दाब के प्रभाव में जब वलन की अक्षीय सतह लगभग क्षैतिज हो जाती है और दोनों भुजाएँ क्षैतिज अथवा निकट-क्षैतिज स्थिति ग्रहण कर लेती हैं, तब यह शयन वलन कहलाता है। यह जटिल पर्वतनिर्माण क्षेत्रों, विशेषतः उच्च रूपांतरणीय पट्टियों, में पाया जाता है।                                                                                                                                                                                      bodhshankh.blogspot.com

  6. प्रतिवलन (Overturned Fold) – इस अवस्था में एक भुजा दूसरी पर उलट जाती है, और दोनों भुजाएँ समान दिशा में झुकती हैं। यह अत्यधिक दाब और संरचनात्मक अस्थिरता का संकेतक है। कई बार यह नप्प संरचनाओं (Nappe Structures) के विकास की पूर्वावस्था हो सकता है।                                                                                       bodhshankh.blogspot.com

  7. खुला वलन (Open Fold) – जब भुजाओं के मध्य अंतःकोण 90° से अधिक हो, तो संपीडन अपेक्षाकृत मध्यम स्तर का माना जाता है। ऐसे वलनों की पहचान स्थलाकृतिक रूप से सरल होती है।                                                           bodhshankh.blogspot.com

  8. बन्द वलन (Closed Fold) – जब अंतःकोण 90° से कम हो जाए और भुजाएँ तीव्रता से निकट आ जाएँ, तो यह तीव्र संपीडनात्मक अवस्था का परिचायक है। संरचनात्मक मानचित्रण में इनकी पहचान विशेष महत्त्व रखती है।

    वलन-विश्लेषण न केवल संरचनात्मक भूविज्ञान का आधार है, बल्कि खनिज संसाधन अन्वेषण, पेट्रोलियम संरचनाओं की पहचान तथा विवर्तनिक इतिहास के पुनर्निर्माण में भी इसकी केंद्रीय भूमिका है।

भ्रंश (Faults) : भंगुर विकृतियों का यांत्रिक विवेचन

    जहाँ वलन लचीली विकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं भ्रंश भंगुर विकृति (Brittle Deformation) का परिणाम हैं। जब शैल-समूहों पर आरोपित तनाव उनकी यांत्रिक दृढ़ता (Mechanical Strength) से अधिक हो जाता है, तब वे टूटकर पृथक् खंडों में विभक्त हो जाते हैं। यदि इस विभंजन के साथ सापेक्षिक विस्थापन घटित हो, तो उत्पन्न संरचना भ्रंश कहलाती है।

भ्रंश का तल (Fault Plane), भ्रंश रेखा (Fault Line) तथा हैंगिंग वॉल (Hanging Wall) और फुट वॉल (Foot Wall) जैसी संकल्पनाएँ इसके विश्लेषण में प्रयुक्त होती हैं। विस्थापन की मात्रा, दिशा एवं प्रकृति से क्षेत्र की विवर्तनिक परिस्थितियों का अनुमान लगाया जाता है।

    भ्रंशों का वर्गीकरण तनाव की प्रकृति के आधार पर निम्न प्रकार है—

  1. सामान्य भ्रंश (Normal Fault) – यह तननात्मक (Tensional) तनाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न होता है। हैंगिंग वॉल, फुट वॉल की अपेक्षा नीचे की ओर खिसक जाती है। यह संरचना प्रायः अपसारी प्लेट सीमाओं (Divergent Plate Boundaries) से संबद्ध है।                                                                                                                      bodhshankh.blogspot.com

  2. उत्क्रम भ्रंश (Reverse Fault) – संपीडनात्मक तनाव के प्रभाव में हैंगिंग वॉल, फुट वॉल के ऊपर चढ़ जाती है। यह अभिसारी प्लेट सीमाओं की विशिष्ट संरचना है।

  3. क्षेप भ्रंश (Thrust Fault) – उत्क्रम भ्रंश का निम्न-कोणीय रूप, जिसमें विस्थापन प्रायः व्यापक एवं दूरगामी होता है। पर्वतनिर्माण क्षेत्रों में विशाल नप्प संरचनाएँ इसी प्रक्रिया से विकसित होती हैं।

  4. सोपानी भ्रंश (Step Fault) – क्रमिक एवं समानांतर भ्रंशों की शृंखला, जिसके परिणामस्वरूप भू-भाग सीढ़ीनुमा संरचना धारण कर लेता है। यह विस्तारशील क्षेत्रों में प्रायः दृष्टिगोचर होता है।

  5. अधिक्षेप भ्रंश (Overthrust Fault) – इसमें विशाल शैल-पिंड लगभग क्षैतिज दिशा में अग्रसर होकर अधोस्थ शैलों पर आरोपित हो जाते हैं। यह अत्यधिक संपीडन और दीर्घकालिक विवर्तनिक दाब का परिणाम है।

  6. तिर्यक भ्रंश (Oblique Slip Fault) – इसमें ऊर्ध्वाधर तथा क्षैतिज दोनों घटक विद्यमान होते हैं। यह संयुक्त तननात्मक एवं कर्तनात्मक तनावों का द्योतक है।

भ्रंशजनित स्थलरूप : रिफ्ट घाटी एवं हॉर्स्ट संरचना

    समानांतर भ्रंशों की परस्पर क्रिया से विशिष्ट भू-आकृतियों का विकास होता है। यदि दो भ्रंशों के मध्य स्थित खंड अवनमित हो जाए, तो रेखीय एवं दीर्घाकार अवसाद का निर्माण होता है, जिसे भ्रंश घाटी या रिफ्ट घाटी कहा जाता है। यह प्रायः महाद्वीपीय अपसारण क्षेत्रों से संबंधित होती है और इसके साथ ज्वालामुखीय गतिविधियाँ भी संबद्ध हो सकती हैं।

                                              bodhshankh.blogspot.com

    इसके विपरीत, यदि मध्यवर्ती खंड उत्थित हो जाए अथवा पार्श्ववर्ती खंड नीचे धँस जाएँ, तो उच्चावस्थित संरचना विकसित होती है, जिसे हॉर्स्ट अथवा ब्लॉक पर्वत कहा जाता है। इसकी विशेषता तीव्र पार्श्व ढालें तथा अपेक्षाकृत समतल शीर्ष सतह है।

                                         bodhshankh.blogspot.com

    इस प्रकार, वलन और भ्रंश न केवल संरचनात्मक भूविज्ञान की आधारभूत संकल्पनाएँ हैं, बल्कि वे पृथ्वी की विवर्तनिक गतिकी, ऊर्जा-संतुलन और भू-आकृतिक विकास के दीर्घकालिक इतिहास को समझने की कुंजी भी प्रदान करते हैं।

NET-JRF के विद्यार्थी अपनी तैयारी की परख करने के लिए ऑनलाइन मॉडल प्रश्न -पत्र हल करने के लिए यहाँ क्लिक करें -

 Geography - 01 
 Geography - 02