दोस्तों, नमस्कार!
आज हम ‘महाद्वीप : एशिया – (3)’ के अंतर्गत एशिया महाद्वीप से संबंधित कुछ अत्यंत रोचक, उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक तथ्यों का विस्तृत अध्ययन करेंगे। एशिया केवल क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से ही विश्व का सबसे बड़ा महाद्वीप नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों, कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास, खनिज संपदा, जैव विविधता तथा सांस्कृतिक वैभव की दृष्टि से भी विश्व में अग्रणी स्थान रखता है। यही कारण है कि एशिया का अध्ययन भूगोल, अर्थशास्त्र, पर्यावरण, अंतर्राष्ट्रीय संबंध तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
पिछले भाग ‘महाद्वीप : एशिया (भाग - 2)’ में हमने एशिया के भौतिक स्वरूप, पर्वतों, पठारों, मैदानों तथा नदियों का अध्ययन किया था। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए आज हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि एशिया किन-किन प्राकृतिक एवं आर्थिक संसाधनों के कारण विश्व में अग्रणी महाद्वीप माना जाता है। साथ ही हम एशिया के प्रमुख देशों की विशिष्ट भौगोलिक, कृषि, औद्योगिक तथा प्राकृतिक विशेषताओं को भी समझेंगे।
एशिया विश्व का सबसे विशाल महाद्वीप है, जो पृथ्वी के कुल स्थल भाग के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर विस्तृत है। यह महाद्वीप क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा है, तथा जनसंख्या की दृष्टि से भी विश्व में प्रथम स्थान रखता है। विश्व की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या एशिया में निवास करती है। यही कारण है कि यहाँ जनशक्ति की प्रचुरता, श्रमबल की उपलब्धता तथा संसाधनों का व्यापक उपयोग देखने को मिलता है। एशिया में प्राकृतिक संसाधनों की विविधता, कृषि की बहुलता, खनिजों की प्रचुरता तथा तकनीकी विकास ने इसे विश्व की आर्थिक धुरी बना दिया है।
एशिया का सबसे बड़ा देश चीन है, जो क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व का तीसरा सबसे बड़ा देश माना जाता है। चीन न एशिया का सबसे विशाल देश है, बल्कि लंबे समय तक विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश भी रहा है। विशाल जनसंख्या के बावजूद चीन ने कृषि, उद्योग, व्यापार और तकनीकी विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्तमान समय में चीन की अर्थव्यवस्था विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मानी जाती है, जो इसे वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
कृषि उत्पादन की दृष्टि से चीन विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है। गेहूँ उत्पादन में चीन विश्व में प्रथम स्थान रखता है, जबकि भारत द्वितीय स्थान पर है। विश्व के कुल गेहूँ उत्पादन में चीन का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार चावल उत्पादन में भी चीन विश्व में प्रथम तथा भारत द्वितीय स्थान पर है। चूँकि एशिया की विशाल जनसंख्या का मुख्य खाद्यान्न चावल है, इसलिए इसका उत्पादन एशियाई अर्थव्यवस्था एवं खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कपास उत्पादन में भी चीन विश्व में प्रथम स्थान रखता है। भारत भी कपास उत्पादन के प्रमुख देशों में शामिल है। सूती वस्त्र उद्योग में चीन विश्व का अग्रणी देश है। चीन का शंघाई क्षेत्र वस्त्र उद्योग का प्रमुख केंद्र है, जिसके कारण इसे “चीन का मैनचेस्टर” कहा जाता है। यह उपाधि इंग्लैंड के मैनचेस्टर नगर की औद्योगिक प्रतिष्ठा के आधार पर दी गई है। चीन की यही विशेषता उसे कृषि एवं उद्योग दोनों क्षेत्रों में संतुलित रूप से सशक्त बनाती है। अधिक जनसंख्या के बावजूद चीन अपनी जनता की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा और आजीविका की पूर्ति करने में सक्षम रहा है।
मक्का उत्पादन में चीन एशिया में प्रथम तथा विश्व में द्वितीय स्थान रखता है। मक्का पशु आहार, खाद्य पदार्थ तथा औद्योगिक उपयोग के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण फसल है। मत्स्य उत्पादन की दृष्टि से भी चीन विश्व का अग्रणी देश है। मछली उत्पादन में चीन प्रथम, भारत द्वितीय तथा जापान तृतीय स्थान पर है। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि एशिया न केवल कृषि उत्पादन में, बल्कि मत्स्य संसाधनों के उपयोग में भी अत्यंत समृद्ध महाद्वीप है।
जापान एशिया का एक अत्यंत विकसित, आधुनिक एवं तकनीकी दृष्टि से उन्नत देश है। जापान को “उगते सूरज का देश” कहा जाता है, क्योंकि यह एशिया के पूर्वी छोर पर स्थित है, जहाँ सूर्य का उदय सर्वप्रथम दिखाई देता है। जापान की राजधानी टोक्यो विश्व के सबसे बड़े महानगरों में गिनी जाती है। टोक्यो जनसंख्या की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक, औद्योगिक एवं तकनीकी दृष्टि से भी विश्व के सबसे महत्त्वपूर्ण नगरों में से एक है।
जापान जलयान निर्माण में विश्व में प्रथम स्थान रखता है। सीमित प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद जापान ने तकनीकी दक्षता, अनुसंधान और औद्योगिक विकास के बल पर विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। जलविद्युत उत्पादन में भी जापान एशिया के प्रमुख देशों में सम्मिलित है। रेशम उत्पादन तथा उसके निर्यात में भी जापान का विशिष्ट स्थान रहा है। जापान की औद्योगिक प्रगति यह सिद्ध करती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मानव कौशल और तकनीकी विकास किसी राष्ट्र को विश्वशक्ति बना सकते हैं।
दक्षिण-पूर्व एशिया के देश प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। थाईलैंड, मलेशिया तथा इंडोनेशिया एशिया के प्रमुख रबर उत्पादक एवं निर्यातक देश हैं। थाईलैंड विश्व का सबसे बड़ा प्राकृतिक रबर उत्पादक देश है। थाईलैंड को “हाथियों का देश” भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ हाथियों की संख्या अधिक है और वे सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं।
मलेशिया टिन उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है और लंबे समय तक इस क्षेत्र में अग्रणी रहा है। टिन एक महत्त्वपूर्ण धातु है, जिसका उपयोग मिश्रधातु निर्माण, पैकेजिंग तथा औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है। इंडोनेशिया भी प्राकृतिक संसाधनों, वन संपदा, पेट्रोलियम और मसाला उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस प्रकार दक्षिण-पूर्व एशिया कृषि, खनिज और वानिकी संसाधनों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र है।
फिलीपींस को “चावल का कटोरा” कहा जाता है। यह उपाधि उसकी कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था को दर्शाती है। फिलीपींस की राजधानी मनीला में अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) की स्थापना की गई है। यह संस्थान चावल की उन्नत किस्मों के विकास, उत्पादन वृद्धि तथा खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में विश्वस्तरीय अनुसंधान करता है। एशिया के चावल उत्पादक देशों के लिए यह संस्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
जूट उत्पादन में बांग्लादेश एशिया में प्रथम स्थान रखता है। जूट को “स्वर्ण तंतु” भी कहा जाता है, क्योंकि इसका आर्थिक महत्त्व अत्यधिक है। गन्ना उत्पादन में भारत एशिया का अग्रणी देश है। भारत की उपजाऊ मिट्टी, अनुकूल जलवायु तथा मानसूनी वर्षा इसे कृषि उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाती है। भारत गेहूँ, चावल, गन्ना, दालें, कपास, चाय तथा मसालों के उत्पादन में विश्व के प्रमुख देशों में शामिल है।
प्राकृतिक विशेषताओं की दृष्टि से भी एशिया अत्यंत अद्वितीय है। विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मावसिनराम (मेघालय, भारत) एशिया में स्थित है, जहाँ औसत वार्षिक वर्षा लगभग 11,405 मि.मी. दर्ज की गई है। यह क्षेत्र अपनी अत्यधिक वर्षा, हरित वनस्पति तथा विशिष्ट जलवायु के लिए विश्व प्रसिद्ध है। भूटान को “Land of Thunderbolt” अर्थात “गरज एवं तूफानों का देश” कहा जाता है। यह नाम वहाँ की पर्वतीय जलवायु एवं तीव्र गर्जन-तूफानों के कारण प्रसिद्ध हुआ।
श्रीलंका अपने बहुमूल्य रत्नों, प्राकृतिक सौंदर्य और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। श्रीलंका के दक्षिणी पर्वतीय क्षेत्रों में बहुमूल्य रत्न पाए जाते हैं, जिसके कारण इसे “पूर्व का मोती” अथवा “रत्न द्वीप” कहा जाता है। नीलम, माणिक और अन्य बहुमूल्य रत्नों के कारण श्रीलंका विश्व के प्रमुख रत्न उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है।
मालदीव एशिया का सबसे छोटा देश है। यह एक द्वीपीय राष्ट्र है, जो हिंद महासागर में स्थित है। यहाँ असंख्य प्रवाल द्वीप पाए जाते हैं, जिसके कारण इसे “मूंगों का द्वीप” कहा जाता है। मालदीव पर्यटन, समुद्री जैव विविधता और प्रवाल भित्तियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
परिवहन की दृष्टि से एशिया का सबसे लंबा और महत्त्वपूर्ण रेलमार्ग ट्रांस-साइबेरियन रेलमार्ग है। यह रेलमार्ग रूस के लेनिनग्राद (वर्तमान सेंट पीटर्सबर्ग) से व्लादिवोस्तोक तक विस्तृत है। इसकी कुल लंबाई लगभग 9,438 किलोमीटर है। यह विश्व के सबसे लंबे रेलमार्गों में से एक है तथा यूरोप और एशिया के मध्य स्थलीय संपर्क का महत्त्वपूर्ण साधन है। यह मार्ग व्यापार, परिवहन और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
प्राकृतिक वनस्पति की दृष्टि से एशियाई रूस का उत्तरी भाग टुण्ड्रा वनस्पति से आच्छादित है, जहाँ अत्यधिक शीत के कारण केवल काई, लाइकेन और छोटी झाड़ियाँ पाई जाती हैं। इसके मध्य एवं पश्चिमी भागों में शंकुधारी अथवा नुकीली पत्तियों वाले टैगा वन पाए जाते हैं। ये वन विश्व के प्रमुख शीतोष्ण शंकुधारी वनों में गिने जाते हैं तथा लकड़ी, कागज और वन उद्योग के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
जलवायु की दृष्टि से साइप्रस, जॉर्डन, तुर्की, इज़राइल तथा लेबनान एशिया के ऐसे देश हैं जहाँ भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है। इस प्रकार की जलवायु में शीत ऋतु में वर्षा तथा ग्रीष्म ऋतु में शुष्कता पाई जाती है। यह जलवायु जैतून, अंगूर, संतरा तथा अन्य फलोत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त मानी जाती है।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि एशिया महाद्वीप प्राकृतिक संसाधनों, कृषि उत्पादन, खनिज संपदा, औद्योगिक विकास, परिवहन, जलवायु, वनस्पति एवं प्राकृतिक विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और विश्व में अग्रणी महाद्वीप है। यही कारण है कि एशिया न केवल भौगोलिक दृष्टि से, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक, सामरिक और वैश्विक महत्त्व की दृष्टि से भी विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण महाद्वीप माना जाता है।
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Geography - 01
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