राजनीतिक विज्ञान सामाजिक विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो राज्य, सरकार, सत्ता, अधिकार, कानून, नीतियों तथा अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन करती है। यह शासन-व्यवस्था का अध्ययन नहीं है, बल्कि मानव के सामूहिक जीवन, संगठन, निर्णय-प्रक्रिया, सत्ता-संबंधों तथा सामाजिक नियंत्रण की संपूर्ण व्यवस्था को समझने का विज्ञान है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में उसके जीवन का संचालन विभिन्न संस्थाओं, नियमों और व्यवस्थाओं द्वारा होता है। इन संस्थाओं और व्यवस्थाओं में सबसे महत्वपूर्ण संस्था राज्य है, जिसके अध्ययन का प्रमुख विषय राजनीतिक विज्ञान है। अतः राजनीतिक विज्ञान का संबंध मानव जीवन के उस क्षेत्र से है, जहाँ शक्ति, शासन, नीति, अधिकार और कर्तव्यों का निर्धारण होता है।
राजनीतिक विज्ञान का स्वरूप समय के साथ निरंतर विकसित हुआ है। प्रारंभ में इसका अध्ययन केवल राज्य और शासन तक सीमित था, परंतु आधुनिक युग में इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक हो गया है। अब यह राज्य और सरकार का अध्ययन ही नहीं करता, बल्कि सत्ता, राजनीतिक व्यवहार, जनमत, राजनीतिक दल, सार्वजनिक नीति, प्रशासन, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तथा वैश्विक संस्थाओं का भी अध्ययन करता है।
राजनीतिक विज्ञान की प्रकृति
राजनीतिक विज्ञान की प्रकृति से आशय उसके मूल स्वरूप, विशेषताओं, अध्ययन-पद्धति तथा उसके ज्ञानात्मक चरित्र से है। राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि यह विषय सत्ता के औपचारिक ढाँचे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के राजनीतिक जीवन का वैज्ञानिक, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक अध्ययन है।
(1) सामाजिक विज्ञान का अंग
राजनीतिक विज्ञान सामाजिक विज्ञान की प्रमुख शाखा है। यह मानव समाज, उसकी संस्थाओं, संबंधों और व्यवहार का अध्ययन करता है। जिस प्रकार समाजशास्त्र समाज का, अर्थशास्त्र आर्थिक क्रियाओं का और इतिहास अतीत की घटनाओं का अध्ययन करता है, उसी प्रकार राजनीतिक विज्ञान मानव के राजनीतिक जीवन का अध्ययन करता है। इसका मुख्य विषय मनुष्य का संगठित जीवन है, जिसमें राज्य, सरकार, कानून और नीतियाँ सम्मिलित हैं।
(2) राज्य और सरकार का विज्ञान
राजनीतिक विज्ञान का पारंपरिक स्वरूप राज्य और सरकार के अध्ययन पर आधारित है। राज्य की उत्पत्ति कैसे हुई, उसका स्वरूप क्या है, उसके उद्देश्य क्या हैं, सरकार किस प्रकार कार्य करती है, शासन के विभिन्न अंगों का क्या स्वरूप है - इन सभी प्रश्नों का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान के अंतर्गत किया जाता है। इसलिए इसे राज्य और शासन का विज्ञान भी कहा जाता है।
(3) सिद्धांत और व्यवहार का समन्वय
राजनीतिक विज्ञान सैद्धांतिक विषय नहीं है। यह एक ओर राजनीतिक सिद्धांतों, आदर्शों और विचारधाराओं का अध्ययन करता है, तो दूसरी ओर राजनीतिक व्यवहार, चुनाव, जनमत, नेतृत्व, नीतियों और प्रशासन की व्यावहारिक प्रक्रियाओं का भी अध्ययन करता है। इस प्रकार इसमें सिद्धांत और व्यवहार दोनों का समन्वय मिलता है।
(4) वैज्ञानिक एवं विश्लेषणात्मक स्वरूप
आधुनिक युग में राजनीतिक विज्ञान का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति से किया जाता है। इसमें तथ्यों का संग्रह, वर्गीकरण, विश्लेषण और निष्कर्ष की प्रक्रिया अपनाई जाती है। राजनीतिक घटनाओं, चुनावी प्रवृत्तियों, जनमत, नीतियों और प्रशासनिक व्यवहार का अध्ययन सर्वेक्षण, सांख्यिकी और अनुभवजन्य पद्धतियों के माध्यम से किया जाता है। इस कारण इसका स्वरूप वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक माना जाता है।
(5) मूल्य-तटस्थता
राजनीतिक विज्ञान का उद्देश्य किसी विशेष विचारधारा, दल या शासन-व्यवस्था का समर्थन या विरोध करना नहीं है। इसका कार्य राजनीति का वस्तुनिष्ठ और तटस्थ अध्ययन करना है। आधुनिक राजनीतिक विज्ञान तथ्यों और निष्पक्ष विश्लेषण पर बल देता है। इसलिए इसे मूल्य-तटस्थ (Value-neutral) विज्ञान भी कहा जाता है।
(6) गतिशील एवं परिवर्तनशील प्रकृति
राजनीतिक विज्ञान स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील और परिवर्तनशील विषय है। समय, परिस्थितियों, विचारों और सामाजिक परिवर्तनों के साथ राजनीति का स्वरूप बदलता रहता है। प्राचीन राजतंत्र से आधुनिक लोकतंत्र, साम्राज्यवाद से राष्ट्रवाद, और राष्ट्रीय राजनीति से वैश्विक राजनीति तक इसका क्षेत्र निरंतर विकसित हुआ है। इसलिए राजनीतिक विज्ञान का स्वरूप भी समयानुसार बदलता रहता है।
(7) बहुविषयी स्वरूप
राजनीतिक विज्ञान का संबंध अनेक अन्य विषयों से है। यह इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, भूगोल, विधिशास्त्र और दर्शनशास्त्र से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। राजनीतिक घटनाओं को समझने के लिए इन सभी विषयों का ज्ञान आवश्यक होता है। इस प्रकार राजनीतिक विज्ञान का स्वरूप बहुविषयी है।
(8) मानवीय और नैतिक पक्ष
राजनीतिक विज्ञान मात्र सत्ता का अध्ययन नहीं करता, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, कर्तव्य और कल्याण जैसे मानवीय मूल्यों का भी अध्ययन करता है। यह भी पूछता है कि राज्य कैसा होना चाहिए। इस दृष्टि से इसका नैतिक और मानवीय स्वरूप भी महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र
राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक और निरंतर विस्तारशील है। इसका संबंध मानव जीवन की उन सभी गतिविधियों से है, जिनका प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध सत्ता, शासन, निर्णय-निर्माण, सार्वजनिक नीति, सामाजिक नियंत्रण, अधिकारों के वितरण तथा संसाधनों के प्रबंधन से होता है। प्रारंभिक काल में राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र मुख्यतः राज्य और सरकार तक सीमित माना जाता था, परंतु आधुनिक युग में इसका स्वरूप अत्यधिक विस्तृत हो गया है। आज यह विषय शासन-व्यवस्था का अध्ययन ही नहीं करता, बल्कि व्यक्ति, समाज, संस्थाओं, नीतियों, राजनीतिक व्यवहार, वैश्विक संबंधों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का भी गहन अध्ययन करता है। इस प्रकार राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय, तुलनात्मक तथा वैश्विक स्तर तक फैल चुका है।
(1) राज्य का अध्ययन
राजनीतिक विज्ञान का प्रमुख और पारंपरिक क्षेत्र राज्य का अध्ययन है। राज्य राजनीतिक संगठन का सर्वोच्च रूप है, इसलिए इसके स्वरूप, तत्व, प्रकृति और उद्देश्यों का अध्ययन राजनीतिक विज्ञान का मूल विषय माना जाता है। इसके अंतर्गत राज्य की उत्पत्ति, विकास, स्वरूप, उद्देश्य, कार्य, प्रभुसत्ता, वैधता तथा राज्य की बदलती भूमिका का विश्लेषण किया जाता है। यह भी देखा जाता है कि राज्य का व्यक्ति और समाज से क्या संबंध है तथा आधुनिक कल्याणकारी राज्य किस प्रकार कार्य करता है।
(2) सरकार का अध्ययन
सरकार राज्य की कार्यकारी और संचालनात्मक संस्था है, जिसके माध्यम से राज्य अपनी नीतियों और निर्णयों को लागू करता है। राजनीतिक विज्ञान में सरकार के स्वरूप, उसके अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के गठन, शक्तियों, कार्यों तथा पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इसके साथ-साथ विभिन्न शासन-प्रणालियों जैसे लोकतंत्र, राजतंत्र, तानाशाही, संसदीय शासन, अध्यक्षीय शासन और संघीय शासन का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता है।
(3) सत्ता और अधिकार का अध्ययन
राजनीतिक विज्ञान में सत्ता (Power), अधिकार (Authority), वैधता (Legitimacy), प्रभुत्व (Influence) तथा नियंत्रण का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजनीति का मूल तत्व सत्ता है, इसलिए यह समझना आवश्यक है कि सत्ता के स्रोत क्या हैं, सत्ता किसके पास होती है, उसे कैसे प्राप्त किया जाता है, उसका प्रयोग किन साधनों से किया जाता है तथा उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस क्षेत्र में यह भी अध्ययन किया जाता है कि अधिकार और सत्ता में क्या अंतर है तथा वैध सत्ता किस प्रकार स्थिर शासन की आधारशिला बनती है।
(4) संविधान और कानून का अध्ययन
राजनीतिक विज्ञान में संविधान, संवैधानिक व्यवस्थाओं, विधिक संस्थाओं, कानूनों तथा नागरिक अधिकारों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। संविधान राज्य का मूल विधिक दस्तावेज है, जो शासन की संरचना, शक्तियों के विभाजन, राज्य के उद्देश्यों और नागरिकों के अधिकारों एवं कर्तव्यों को निर्धारित करता है। इस क्षेत्र में संवैधानिक संशोधन, न्यायिक व्याख्या, विधि का शासन, मौलिक अधिकार तथा संवैधानिक मूल्यों का भी अध्ययन किया जाता है।
(5) राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन
राजनीतिक विज्ञान में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दल, दबाव समूह, हित समूह, निर्वाचन आयोग, नौकरशाही, संसद, मंत्रिमंडल, न्यायपालिका, स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ तथा नागरिक संगठन इस क्षेत्र के प्रमुख अंग हैं। इन संस्थाओं के संगठन, कार्य, प्रभाव, उत्तरदायित्व तथा राजनीतिक व्यवस्था में उनकी भूमिका का विश्लेषण किया जाता है।
(6) राजनीतिक प्रक्रियाओं का अध्ययन
राजनीतिक विज्ञान केवल संस्थाओं का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रक्रियाओं का भी अध्ययन करता है। इसके अंतर्गत चुनाव, मतदान, जनमत, राजनीतिक संचार, नेतृत्व, राजनीतिक समाजीकरण, राजनीतिक सहभागिता, प्रतिनिधित्व, नीति-निर्माण तथा निर्णय-प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है। यह क्षेत्र इस बात को समझने का प्रयास करता है कि नागरिक किस प्रकार राजनीति में भाग लेते हैं और राजनीतिक निर्णय कैसे निर्मित होते हैं।
(7) सार्वजनिक प्रशासन
राजनीतिक विज्ञान का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र सार्वजनिक प्रशासन है। यह सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों के व्यावहारिक क्रियान्वयन से संबंधित है। इसके अंतर्गत प्रशासनिक संगठन, प्रशासनिक सिद्धांत, नौकरशाही, प्रशासनिक उत्तरदायित्व, प्रशासनिक सुधार, नीति-क्रियान्वयन तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की प्रशासनिक संरचना का अध्ययन किया जाता है। सार्वजनिक प्रशासन यह स्पष्ट करता है कि शासन की सफलता नीति-निर्माण पर नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी निर्भर करती है।
(8) सार्वजनिक नीति
राजनीतिक विज्ञान में सार्वजनिक नीति (Public Policy) का अध्ययन एक आधुनिक और अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसके अंतर्गत सरकार द्वारा निर्मित नीतियों, योजनाओं, कार्यक्रमों तथा विकासात्मक निर्णयों का अध्ययन किया जाता है। यह देखा जाता है कि नीतियाँ कैसे बनती हैं, किन संस्थाओं द्वारा निर्मित होती हैं, किन हितों से प्रभावित होती हैं तथा समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है। शिक्षा नीति, स्वास्थ्य नीति, आर्थिक नीति, पर्यावरण नीति आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
(9) अंतर्राष्ट्रीय संबंध
राजनीतिक विज्ञान का क्षेत्र राष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक संबंधों का भी अध्ययन करता है। इसके अंतर्गत राष्ट्रों के बीच संबंध, विदेश नीति, कूटनीति, युद्ध और शांति, शक्ति-संतुलन, अंतर्राष्ट्रीय संगठन, वैश्विक शासन तथा अंतर्राष्ट्रीय कानून का अध्ययन किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, क्षेत्रीय संगठन तथा वैश्विक संकटों का अध्ययन भी इसी क्षेत्र में सम्मिलित है।
(10) राजनीतिक विचारधाराएँ
राजनीतिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का अध्ययन है। उदारवाद, समाजवाद, साम्यवाद, राष्ट्रवाद, फासीवाद, लोकतंत्र, नारीवाद, पर्यावरणवाद तथा मानवाधिकारवाद जैसी विचारधाराएँ राजनीतिक चिंतन को दिशा प्रदान करती हैं। इनके माध्यम से यह समझा जाता है कि समाज, राज्य, सत्ता, स्वतंत्रता, समानता और न्याय के संबंध में विभिन्न विचारधाराएँ क्या दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं और वे राजनीतिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
राजनीतिक विज्ञान के परम्परागत एवं आधुनिक दृष्टिकोण
राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में समय-समय पर अनेक दृष्टिकोण विकसित हुए हैं, जिनके माध्यम से राजनीति के स्वरूप, कार्यप्रणाली और उद्देश्यों को समझने का प्रयास किया गया है। इनमें परम्परागत दृष्टिकोण और आधुनिक दृष्टिकोण दो प्रमुख अध्ययन-पद्धतियाँ मानी जाती हैं। ये दोनों दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान के विकास के दो महत्वपूर्ण चरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। परम्परागत दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान के शास्त्रीय, दार्शनिक और संस्थागत स्वरूप को स्पष्ट करता है, जबकि आधुनिक दृष्टिकोण राजनीति के वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और व्यवहारगत अध्ययन पर बल देता है। दोनों दृष्टिकोण राजनीति को समझने की भिन्न-भिन्न पद्धतियाँ प्रस्तुत करते हैं, परंतु दोनों का उद्देश्य राजनीतिक जीवन की गहन व्याख्या करना ही है।
(A) परम्परागत दृष्टिकोण
परम्परागत दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान का प्राचीन, शास्त्रीय और दार्शनिक स्वरूप है। यह दृष्टिकोण मुख्यतः राज्य, सरकार, संविधान, विधि, नैतिकता, न्याय और आदर्शों पर आधारित अध्ययन को महत्व देता है। इस दृष्टिकोण का विकास प्राचीन यूनानी विचारकों से लेकर आधुनिक युग के प्रारंभिक राजनीतिक चिंतकों तक हुआ। परम्परागत विचारकों ने राजनीति को सत्ता की प्रक्रिया नहीं माना, बल्कि उसे नैतिक जीवन, आदर्श राज्य और उत्तम शासन की व्यवस्था के रूप में देखा। इस दृष्टिकोण में यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण था कि राज्य क्या है, उसका उद्देश्य क्या होना चाहिए, और शासन किस प्रकार आदर्श रूप में संचालित होना चाहिए।
प्रमुख विशेषताएँ
सांस्थानिक अध्ययन – परम्परागत दृष्टिकोण में राज्य, सरकार, संसद, न्यायपालिका, कार्यपालिका और अन्य औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन प्रमुख रूप से किया जाता है। यह दृष्टिकोण संस्थाओं की संरचना, कार्य और महत्व को समझने पर बल देता है।
विधिक-संवैधानिक दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोण में संविधान, कानून, विधिक व्यवस्थाओं और औपचारिक शासन-संरचनाओं का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए संवैधानिक प्रावधानों का विश्लेषण किया जाता है।
आदर्शवादी स्वरूप – परम्परागत दृष्टिकोण राजनीति को नैतिकता, न्याय, आदर्श राज्य और उत्तम शासन की अवधारणाओं से जोड़कर देखता है। इसमें यह विचार प्रमुख है कि राजनीति का उद्देश्य केवल शासन नहीं, बल्कि समाज में न्याय और कल्याण की स्थापना है।
दार्शनिक आधार – यह दृष्टिकोण प्लेटो, अरस्तू, हॉब्स, लॉक, रूसो, हेगेल और मैकियावेली जैसे महान विचारकों के सिद्धांतों पर आधारित है। इन विचारकों ने राज्य, अधिकार, स्वतंत्रता, न्याय और शासन के संबंध में गहन चिंतन प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण – परम्परागत अध्ययन में राजनीतिक संस्थाओं, विचारों और व्यवस्थाओं के ऐतिहासिक विकास का अध्ययन किया जाता है। इससे राजनीतिक संस्थाओं की उत्पत्ति और विकास को समझने में सहायता मिलती है।
मानवतावादी दृष्टिकोण – यह दृष्टिकोण राजनीति को शक्ति-संघर्ष के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे मानवीय मूल्यों, नैतिकता, कर्तव्य, न्याय और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़कर समझता है।
वर्णनात्मक प्रकृति – परम्परागत दृष्टिकोण का स्वरूप मुख्यतः वर्णनात्मक है। इसमें राजनीतिक संस्थाओं, व्यवस्थाओं और सिद्धांतों का विवरणात्मक अध्ययन अधिक किया जाता है।
सीमाएँ
यह वास्तविक राजनीतिक व्यवहार की अपेक्षा आदर्शों, सिद्धांतों और संस्थागत स्वरूप पर अधिक केंद्रित है।
यह अनुभवजन्य, सांख्यिकीय और वैज्ञानिक अध्ययन-पद्धतियों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है।
यह राजनीतिक व्यवहार, जनमत, मतदाता-प्रवृत्तियों और समूह-राजनीति जैसे व्यावहारिक पक्षों की उपेक्षा करता है।
इसका दृष्टिकोण अधिकतर दार्शनिक और आदर्शवादी होने के कारण कभी-कभी यथार्थ राजनीति से दूर प्रतीत होता है।
(B) आधुनिक दृष्टिकोण
आधुनिक दृष्टिकोण राजनीतिक विज्ञान का वैज्ञानिक, अनुभवजन्य, विश्लेषणात्मक और व्यवहारवादी स्वरूप है। इसका विकास विशेषतः द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ, जब राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में वैज्ञानिक पद्धतियों, अनुभवजन्य तथ्यों और व्यवहारगत विश्लेषण को महत्व दिया जाने लगा। आधुनिक दृष्टिकोण ने राजनीति के अध्ययन को राज्य और संस्थाओं तक सीमित न रखकर व्यक्ति, समूह, व्यवहार, प्रक्रियाओं और निर्णय-निर्माण तक विस्तृत किया। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजनीति को समझने के लिए संविधान और संस्थाएँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि यह जानना भी आवश्यक है कि व्यक्ति और समूह वास्तव में राजनीतिक प्रक्रिया में कैसे व्यवहार करते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
व्यवहारवादी दृष्टिकोण – आधुनिक दृष्टिकोण में व्यक्ति और समूह के राजनीतिक व्यवहार का अध्ययन किया जाता है। यह देखा जाता है कि नागरिक, मतदाता, नेता और समूह राजनीतिक प्रक्रिया में किस प्रकार व्यवहार करते हैं।
वैज्ञानिक पद्धति – आधुनिक दृष्टिकोण सर्वेक्षण, सांख्यिकी, डेटा-संग्रह, प्रश्नावली, साक्षात्कार, तुलनात्मक अध्ययन और अनुभवजन्य विश्लेषण का प्रयोग करता है। इससे राजनीतिक अध्ययन अधिक वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक बनता है।
अंतर-विषयक स्वरूप – यह दृष्टिकोण समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानवशास्त्र और सांख्यिकी जैसे विषयों से गहराई से जुड़ा हुआ है। राजनीति को व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझने के लिए इन विषयों का सहारा लिया जाता है।
प्रणाली सिद्धांत – डेविड ईस्टन के अनुसार राजनीति एक प्रणाली है, जिसमें समाज से मांगें और समर्थन (inputs) आते हैं तथा निर्णय और नीतियाँ (outputs) निकलती हैं। यह दृष्टिकोण राजनीति को एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में देखता है।
संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण – गेब्रियल आल्मंड के अनुसार राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन उनके कार्यों और भूमिकाओं के आधार पर किया जाना चाहिए। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि विभिन्न संस्थाएँ राजनीतिक व्यवस्था में क्या भूमिका निभाती हैं।
तथ्य-आधारित विश्लेषण – आधुनिक दृष्टिकोण में निष्कर्ष आदर्शों के बजाय तथ्यों, आंकड़ों और अनुभवजन्य प्रमाणों पर आधारित होते हैं। इससे अध्ययन अधिक प्रमाणिक और निष्पक्ष बनता है।
राजनीतिक प्रक्रियाओं पर बल – आधुनिक दृष्टिकोण चुनाव, मतदाता व्यवहार, नेतृत्व, राजनीतिक दल, दबाव समूह, जनमत, राजनीतिक संचार और निर्णय-निर्माण की प्रक्रियाओं का विस्तृत अध्ययन करता है।
मूल्य-तटस्थता – आधुनिक दृष्टिकोण राजनीति के अध्ययन को वस्तुनिष्ठ और तटस्थ बनाने का प्रयास करता है। इसका उद्देश्य किसी विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि राजनीतिक तथ्यों का निष्पक्ष विश्लेषण करना है।
सीमाएँ
यह नैतिकता, आदर्शों और मूल्यपरक प्रश्नों की अपेक्षाकृत उपेक्षा करता है।
अत्यधिक वैज्ञानिक और तकनीकी होने के कारण यह सामान्य विद्यार्थियों के लिए जटिल प्रतीत हो सकता है।
कभी-कभी यह राजनीति के मानवीय, नैतिक और दार्शनिक पक्ष को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
केवल तथ्यों और आंकड़ों पर अत्यधिक निर्भरता कभी-कभी राजनीति की गहरी मानवीय संवेदनाओं को अनदेखा कर देती है।
इस प्रकार परम्परागत दृष्टिकोण जहाँ राजनीतिक संस्थाओं, आदर्शों और नैतिकता पर बल देता है, वहीं आधुनिक दृष्टिकोण राजनीतिक व्यवहार, तथ्यों और वैज्ञानिक अध्ययन को महत्व देता है। राजनीति को समग्र रूप से समझने के लिए दोनों दृष्टिकोणों का समन्वित अध्ययन आवश्यक है।